Thursday, 31 May 2018

అనైతిక విరోధం (అనువాద లేఖ)

ఒక ధనికుడు ఉండేవాడు. అతడు పేదవారికి, భిక్షుకులకు నెలకింత అని డబ్బు దానం చేస్తుండేవాడు. ఒకరికి పది రూపాయలు, ఒకరికి యాభై- అట్ల ఒక కచ్చితమైన రోజున పిలిచి ధనం ఇచ్చేవారు. ఇట్ల ఏళ్ళ తరబడి సాగింది. ఒక ముసలి బిచ్చగాడిది పెద్దకుటుంబం, నెలకు యాభై రూపాయలు వచ్చేవి. ప్రతి నెలా అట్లాగే వచ్చి తీసుకుపోయేవాడు.
          ఒకసారి ఆ రోజున పైసలు తీసుకుపోవటానికి వస్తే మేనేజరు అన్నాడు- ‘ఈనెల నుంచి కాస్త ఇబ్బంది కారణంగా యాభై రూపాయలు రావు. పాతికే వస్తాయిఅని. ముసలివాడికి కోపం వచ్చింది. ‘ఎప్పుడూ యాభై వచ్చేవి, యాభై ఇవ్వంది ఇటునుంచి కదలను. ఎందుకు తగ్గించారు?’ అని అడిగాడు. మేనేజరు అన్నాడు- ‘ఎవరైతే నీకు నెలకింత అని ఇస్తున్నారో అతనికి ఒకతే కూతురు. ఆమె వివాహం కుదిరింది. దానికోసం పెద్ద ఎత్తున ఖర్చు పెట్టాలి. కాస్త కష్టమే. అందుకని తగ్గించారు.’ ఆ బిచ్చగాడు అది విని గట్టిగా బల్లపై గుద్ది, ‘ఇదేంటి? దీని అర్థమేంటి? ఏమనుకుంటున్నారు మా గురించి? నేనేమైనా బిర్లానా? నా డబ్బు లో తగ్గించి కూతురికి పెళ్ళి చేస్తాడా!! కావాలంటే తన డబ్బు ఖర్చుపెట్టుకోమను.. నా డబ్బెందుకు తగ్గించినట్టు?’ అన్నాడు.
          చాలా ఏళ్ళుగా అతగాడికి నెలకు యాభై వస్తుంది. అలవాటైపోయింది. అధికారి అయిపోయాడు. అదంతా తనదే అనుకున్నాడు. అందులో పాతిక తగ్గేసరికి వ్యతిరేకించాడు. కానీ ఇన్నేళ్ళుగా వస్తున్న డబ్బుకు ఆ ధనికుడికి ఎన్నడూ ధన్యవాదాలు మాత్రం చెప్పలేదు.
          (ఈ కథ నాకు ఆరక్షణ్ (రిజర్వేషన్) మీద టిప్పణిగా వచ్చింది. బిచ్చగాళ్ళలా చేయవద్దు, మీకు మీరు సమర్థులు కాండి- అనే సందేశంతో. దీనినే భగవంతుడి పరంగా కూడా తీసుకోవచ్చు. మన ఇష్టం.)
[ఒక హిందీ వాట్సాప్ సందేశానికి తెలుగు అనువాదం]
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మూలలేఖ

नाजायज़ विरोध
सुना है, एक बहुत बड़ा अमीर आदमी था।
उसने अपने गांव के सब गरीब लोगों के लिए, भिखमंगों के लिए माहवारी दान बांध दिया था।
किसी भिखमंगे को दस रुपये मिलते महीने में, किसी को बीस रुपये मिलते। वे हर एक तारीख को आकर अपने पैसे ले जाते थे। वर्षों से ऐसा चल रहा था। एक भिखमंगा था जो बहुत ही गरीब था और जिसका बड़ा परिवार था। उसे पचास रुपये महीने मिलते थे। वह हर एक तारीख को आकर अपने रुपये लेकर जाता था।
एक तारीख आई। वह रुपये लेने आया, बूढ़ा भिखारी। लेकिन धनी के मैनेजर ने कहा कि भई, थोड़ा हेर-फेर हुआ है। पचास रुपये की जगह सिर्फ पच्चीस रुपये अब से तुम्हें मिलेंगे। वह भिखारी बहुत नाराज हो गया। उसने कहा, क्या मतलब? सदा से मुझे पचास मिलते रहे हैं। और बिना पचास लिए मैं यहां से न हटूंगा। क्या कारण है पच्चीस देने का?
मैनेजर ने कहा कि जिनकी तरफ से तुम्हें रुपये मिलते हैं उनकी लड़की का विवाह है और उस विवाह में बहुत खर्च होगा। और यह कोई साधारण विवाह नहीं है। उनकी एक ही लड़की है, करोड़ों का खर्च है। इसलिए अभी संपत्ति की थोड़ी असुविधा है। पच्चीस ही मिलेंगे।
उस भिखारी ने जोर से टेबल पीटी और उसने कहा, इसका क्या मतलब? तुमने मुझे क्या समझा है? मैं कोई बिरला हूं? मेरे पैसे काट कर और अपनी लड़की की शादी? अगर अपनी लड़की की शादी में लुटाना है तो अपने पैसे लुटाओ।
कई सालों से उसे पचास रुपये मिल रहे हैं; वह आदी हो गया है, अधिकारी हो गया है; वह उनको अपने मान रहा है। उसमें से पच्चीस काटने पर उसको विरोध है तुम्हें जो मिला है उसे तुम अपना मान रहे हो। उसमें से कटेगा तो तुम विरोध तो करोगे, लेकिन उसके लिए तुमने धन्यवाद कभी नहीं दिया है।
इस भिखारी ने कभी धन्यवाद नहीं दिया उस अमीर को आकर कि तू पचास रुपये महीने हमें देता है, इसके लिए धन्यवाद। लेकिन जब कटा तो विरोध।
आरक्षण की स्थिति ठीक ऐसी ही है ।कुछ विशेषाधिकार दिए गए थे इन्हें , उनमें से शासन ने यदि कुछ वापस ले लिये तो इतना हो हल्ला।
और फिर सारे अधिकार समाप्त नहीं किए गये केवल उनके दुरुपयोग को रोकने के प्रयास किया गया है तो फिर विरोध कैसा?
सक्षम बनों भिखारी नहीं।
 

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